समय के सदूपयोग में मनोबल का उपयोग कैसे करेंगे ?

आप समय का महत्व जानते हैं, समझते हैं, स्वीकार करते हैं | आप इसके लिए आतुर भी हैं की उसका सदुपयोग हो, फिरभी कई बार ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं की आपका मन डगमगाने लगे | उस समय आप कुछ चल छिद्र ढूंढने का प्रयास करते हैं | जैसे :

जब आप बहुत व्यस्त हों या त्रस्त हों तब आयोजन करने की इच्छा धीमी पड़ जाती हैं |

आप केवल लघु प्रयास  करना चाहते हों और आपका यह प्रयास आपको शुन्य की और खींचते जाता हैं | यह अति आवश्यक हैं की उस समय आप योजना से चिपके रहे | आप यह समझते भी हैं फिर भी उस योजना को छोड़ने की इच्छा बलवंती होती रहती हैं |

आप A-1  श्रेणी के काम करने के लिए  तैयार है फिर भी उससे मुक्त होने के लिए आप का मन नए नए बहाने ढूंढ़ता रहता हैं | उस वक्त आप इन बहानो के वश में न हो जाएं इसके लिए संघर्ष करना पड़ता हैं |

जब अपने कोई कार्य आरंभ किया हो और इस बीच अपेक्षित परिणाम न दिखाई दे तब मन आपको नकारात्मकता की और ले जाता हैं |

आप अपने समग्र जीवन को लक्ष्य में रखकर एक या दो ध्येय निश्चित करते हैं | सिर्फ ध्येय निश्चित करने से कुछ नहीं होता | उसके अनुसार कुछ न कुछ कार्य  भी करना पड़ता हैं | इसके लिए आप निश्चय भी कर लेते हैं फिर भी उससे डटें रहना कठिन लगता हैं |

सचमुच के भय या कल्पित भय के कारणों से आपकी इच्छा , प्रयास मंद करने की हो उठती है |

आप के पास दो-चार कार्य हैं | उनमे से एक A कोटि का कार्य हैं और बाकी C  कोटि के हैं | आपका मन मूल्य की दृष्टी से कम महत्व वाले c कोटि से सरल कार्य की और झुकने लगता हैं |

इन परिस्तिथियों में आपको अपने मनोवल को कुछ दृढ़ बनाना पड़ता हैं | अगर आपके पास मनोवल को दृढ़ करने का संकल्प न हो तो इस पुस्तक की सूचनाएं उपयोगी नहीं हो सकती हैं | कहते है की ‘मन के हरे हार हैं नाम के जीते जीत |’ विजय उसी की होती हैं जो मन को जीत लेता हैं और उसे अपनी इच्छा अनुसार चला सकता हैं |

अब हम यह विचार करेंगें की मनोबल की सहायता कैसे ले सकते हैं :

  • जंगली घोड़े को वश में कारना  और मनोबल का विकास करना दोनों ही काम एक सामान हैं | ये दोनों क्रियाएं आहिस्ता-आहिस्ता की जा सकती हैं |एक-एक कदम आगे बढाकर ऐसा किया जा सकता हैं | इसका एक सरल मार्ग हैं | ऐसा नहीं हैं  की इसके लिए आपको बहुत त्याग करना पड़ेगा | उपरी  दृष्टी से आपको यह तुच्छ दिखे देगा | मगर ऐसा भ्रम मन में पैदा हो , उससे  पूर्व ही उसको मन से निकल दीजिये | उसकी सकती या विशिष्टता कम न औंके| आप इस दिशा में प्रयत्न जारी रखें | आनंद आएगा |
  • यदि आप A श्रेणी के कार्य को टालेंगे या ठेलेंगे तो इसके लिए कोण जिम्मेदार होगा? आयकर का फार्म भरने के लिए आय-व्यय की सूचि बनाने का फैसला करते हैं  और रात को घर आकर टी.वी. के सामने बैठ जाते हैं | सुबह छह बजे उठने का विचार करते हैं और साढ़े सात बजे तक बिस्तर छोड़ने की तत्परता भी नहीं दिखाते | अतः इतना विचार कर देख लीजिये: आय -व्यय के हिसाब करने की अपेक्षा टी-वी  के सामने बैठने का निर्णय किसने किया था? आपको इस सूचि को बनाबे से किसने रोका था ? अथवा छह  बजे बिस्तर से उठने में आपको किसने ढीला बना दिया था ? इस अवसर पर आप अपने मन में स्पष्टा कीजिये : ‘यह गलती मैंने की हैं | अतः इसका जिम्मेदार भी में ही हूँ  |’

इस मौके  मुझे एक विद्यार्थी की बात याद आती हैं | उसकी बहुत बड़ी इच्छा थी की रोज प्रातः काल पञ्च बजे उठकर पढाई करे | वहा रोज ही कहता था : ‘मुझे तो सुबह बहुत जल्दी उठाना है पर घर में मुझे कोई उठता ही नहीं  ! फिर में क्या करूं?’ इस प्रकार  अपनी जिम्मेदारी को दुसरे के सर मढ़ने वाला व्यक्ति क्या अपनी इच्छा अनुसार कुछ कर सकता हैं ? मतलब की जबतक सुबह जल्दी न उठने की जिम्मेदारी वहा स्वयं की नहीं समझेगा , तबतक उसके सामने अच्छे परिणाम भी कैसे आयेंगे ?

 



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greendot
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